गुफ्तगू


गुफ्तगू,वार्तालाप..

याद किजिए वो दिन जब चाय कि टपरी पर होती थी बातें. अखबार भी होता था इन चाय की टपरीयों पर और कुर्सियां भी | अखबार पढ़कर देश विदेश की चर्चा होती थी और कभी बेहस भी होती थी|बेहस ऐसी जो माहौल खराब ना करे ,क्या है ना अगले दिन चाय की टपरी पे दुबारा मिलना जो था |


कुछ वक़्त आगे बड़ गया ,कुछ हम बदल गए ! चाय की टपरीयां थो आज भी हैं , पर वक़्त का आभाव ही कहिये , बातचीत नहीं होती वहां |


अब बेहस का क्या ही कहें?


बेहस थो TV और News चैनल पे ही होती है आज कल| ऐसी बेहस जो बातचीत कम और लडाई ज़्यादा होती है|


गुफ्तगू,हमारी एक पेहल है ऐसी जहाँ हम चाहते हैं की लोग बातचीत कर पायें , बेहस कर पायें , ये जान पायें की विचार अलग होने के बावजूद, बातचीत हो सकती है , बेहस भी , मगर चाय की टपरी वाली बेहस , जो माहौल खराब ना करे |


हमारी कोशिश ये है की यहाँ हम आपको ऐसा मंच दें जहाँ आप अपने विचारों को शब्दों से ,कविताओं से , कला के ज़रिये दर्शा पायेँ |


गुफ्तगू की इच्छा अगर आप मे हैं तो हमें लिखिए incessant.guftagoo@gmail.com पर|


आईए बात करें, क्या कहते हैं, चाय पर ?

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